कोई भी राष्ट्र एक राष्ट्रीय चेतना से बनता है। चन्द्रगुप्त विक्रमदित्या के समय सन् 399 से 414 तक हिंदुस्तान की यात्रा करने वाला चीनी यात्री फाह्यान भी भारत की राष्ट्रीय चेतना से प्रभावित था। ये ही भारत की राष्ट्रीय चेतना अंग्रेजों के लिए भारत के ऊपर शासन करने में मुख्य रूकावट थी। भारत की राष्ट्रीय चेतना को विभाजित करने के लिए अंग्रेजों ने भारतीय समाज में स्वर्ण-अवर्ण के अंतर्द्वंद उभारे। यहाँ विद्वानों का एक समूह कहता है कि अगर अंतर्द्वंद होते ही न तो उन्हें अंग्रेज कैसे उभारते, इसलिए हमे सर्वप्रथम यह स्पष्ट कर लेना चाहिए की हर समाज में एकरूपता के साथ भिन्नताएं भी समायी होती हैं। यहाँ तक की एक ही परिवार के व्यक्तियों में भी भिन्नताएं होती हैं। अब अगर हम परिवार को मूल्यपरक संस्था मानते हैं तो भिन्नताओं के साथ समन्वय पर बल दिया जायेगा। यही एकरूपता व भिन्नता भारतीय समाज में थी। विश्व इतिहास साक्षी रहा है कि मानवीय संस्कृति का इतिहास का उषा काल सगोत्रीय समूह और कबीलाई समूहों के बीच परस्पर युद्धों का काल रहा है। पराजित कबीलों के लोगों को ज़िंदा पकड़ के दास बनाया जाता था। तथाकथित महान रोम सभ्यता भी इन्ही दासों के श्रम पर पल्लवित हुई थी जहाँ दास पशु की भांति बाड़े में बन्द कर दिए जाते थे। उन्हें बाज़ार में बेच जाता था और मनोरंजन के लिए दो दासों को तलवारें देकर उन्हें लड़ाकर एक के मरने तक का खेल ग्लेडिएर देखना यूरोपीय मालिकों का प्रचलित शौक था। इस दास प्रथा का विवरण प्लेटो और अरस्तु के ग्रन्थों में भी उपलब्ध है। भारत में इस समानार्थक काल वर्ण व्यवस्था का काल है जिसमे पराजित कबीले के लोगों ने शूद्र के रूप में समाज में स्थान पाया। निश्चित की उनका स्थान समाज में निम्नतर था लेकिन रोम की भांति उन्हें ग्लेडिएर के लिए बाध्य नही किया जा सकता था। यह ध्यान देने योग्य बात है कि हारे हुए कबीले के लोगों को शूद्र का स्थान दिया जाता था। चीनी यात्री हवेंगसांग भी भारतीय गांवों के बारे में लिखता है कि मदिरापान करने वालों को गाँव के बाहर रखा जाता है न की किसी को जाती के हिसाब से। शूद्रों की कथा भी हरीशचंद्र की कहानी कहती है जो एक दास के रूप में एक डोम के यहाँ बिके, एक निम्नतर शूद्र के यहाँ दास बने रजा हरीशचंद्र। इस मूलयांकन से भारतीय सभ्यता अन्यों से अधिक मानवीय और उम्दा साबित होती है। लेकिन यहाँ भी अंग्रेजों ने मनु स्मृति जैसे ग्रंथों को निरंतर छपवाकर यह भृम फैलाया कि दुनिया में केवल भारत एक ऐसा देश है जहाँ शूद्रों पर अमानवीय दमन अतीत से अब तक निरंतर किया जा रहा है और इसी आधार पर अंग्रेजों के द्वारा भारत को तोड़ने के लिया स्वर्ण विरोधी दलित आंदोलन खड़ा किया गया। अगर हम इतिहास के पन्हे पलटकर देखे तो पता चलता है कि अंग्रेजों को छोड़कर किसी भी भारतीय राजा ने भारत में मनु स्मृति के आधार पर शासन नहीं किया। भारत में जातियां हमेशा से रही हैं लेकिन जातीय भेदभाव कभी नही रहा। जिस प्रकार अंग्रेजों ने जातीय भेदभाव को झूठा आधार बना के भारत को बांटा, उसी तरह से आज की राजनेतिक पार्टियां हमे आज अपने फायदे के लिए बाँट रही हैं।
प्राचीन भारत के गांवों में ज्यादातर किसान जाट और राजपूत होते थे। जापानी स्कालर फकोयमा ने अपने शोध कार्य में भारत के एक गाँव का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि किसान के छह सहयोगी गाँव में रहते थे जैसे लोहार, बढ़ई, धोबी, पुजारी, ज्योतिषी, तेली और कुछ अन्य सहयोगी जो गाँव के बाहर रहते थे। वे फसल के विशेष् अवसरों पर आकर किसान का सहयोग देते थे। इसमें कटाई से सहयोग से लेकर लकड़ी का सामान बेचने वाले लोग थे। इन सभी का वर्ण शूद्र ही माना जाता था। मंदिर का पुजारी भी इसी में गिना जाता था। इसके बदले में गाँव का किसान पूरे गाँव को अन्न उपलब्ध कराता था और पूरे गाँव के लिए उत्पादन करके अपनी सेवाएं उपलब्ध कराता था। यह दिखाता है कि गाँव में हर जाति के बीच सामंजस्य था, भेदभाव नहीं। शादी विवाह के मौके पर पूरे गाँव की दावत हुआ करती और इनमें खाना एक ही साथ बनता था और आयोजक ही सबको खिलाता था। अगर गाँव में कोई त्यौहार किसी जाति विशेष का होता था तो त्यौहार मनाने वाले अन्य जातियों को अपने त्यौहार का प्रसाद और पकवान भेजकर अन्यों की भागीदारी अपने त्यौहार में करते थे। इसी काल में निम्न जातीय छीपी नामदेव, जुलाहे कबीर, चमार रैदास, नाई सेन, लेखाकार गुरु नानक का संत के रूप में प्रतिषिठ हो जाना क्या जातीय प्रेम नहीं दिखाता? राजपुतवंशीय मीरा अगर गुरु रैदास को मानकर उनके सामने शीश झुकाती है तो क्या यह जातीय प्रेम नहीं माना जायेगा? संत ज्ञानेश्वर अगर मराठी में गीता लिखकर संस्कृत के बल पर वर्चस्व स्थापना के ब्राह्मणीय षड्यंत्र को चुनोती देते हैं तो क्या यह और ज्यादा जातीय प्रेम की तरफ बढ़ने का कदम नही माना जायेगा। वर्तमान मे जाट और दलित समुदाय के बीच कुछ टकराव की घटनाएँ हुई है जिससे यह भ्रम उत्पन्न हो रहा है कि जाट समुदाय दलित विरोधी है ।दरअसल यह अवधारणा भ्रम मात्र है और कुछ आपसी घटनाओ को एक व्यवस्था से जोड़ कर यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि जाट दलित टकराव किसी श्रेष्ठता की भावना से उत्पन्न हो रहा है। वास्तव मे वर्ण व्यवस्था मे जाट और दलित दोनो ही समुदायो को शूद्र का दर्जा दिया गया है ।जाट और दलित दोनो ही ऐसे वर्ग है जो एक दूसरे पर निर्भर रहते है जिसे इन्टर डिपेंडेंस कह सकते है। जो एक दूसरे के बिना काम नही चला सकते।इसलिए इनके टकराव या उत्पीडन की स्थिति का वास्तव मे कोई कारण एवं प्रमाण नही है।
तो आज के दिन भी अपने राजनेतिक फायदे के लिए जातीय भेदभाव को बढ़ाने के लिये ये अंग्रेजों के पुत्र हमारे राजनेताओं के रूप में आज भी हमारे बीच में है। साथियों समय की ज़रूरत है की हम अपने सच्चे इतिहास को जाने और अपने देश की एकता को बनाये रखे।