जैसे-जैसे हमने तरक़्क़ी की सीढियाँ चढ़नी शुरू की वैसे-वैसे हम स्वार्थी और self centered हो गए । देखते ही देखते परिवार टूटने लगे और सयुंक्त परिवार एकल परिवारो में परिवर्तित होने लगे।लेकिन परिवार संयुक्त हो या एकल हर परिवार मे माँ को विशेष स्थान मिला है । इतिहास गवाह है कि हमारे देश में अनेक ऐसे महान पुरुष पैदा हुए जिन्हें माँ के नाम से जाना गया जैसे गंगा पुत्र, देवकी नंदन,कुंती पुत्र आदि। और हो भी क्यूँ ना क्योंकि हमारे देश की माँ वो शेरनी हैं जो अपने जिगर के टुकड़े को युद्ध के मैदान में भेजती है तो उसे प्रेरित करते हुए कहती है कि बेटा ! मत मेरा दूध लजाना ,एक इंच पीछे मत हटना चाहे इंच -इंच कट जाना। लेकिन मैं इसे दुर्भाग्य ही कहूँगी की बदलते इस दौर में रिश्तों के मायने भी बदलने लगे और माँ को देवी की तरह पूजने वाले देश में निर्भय और स्वीटी कांड होने लगे।आंकडे बताते है कि लगभग 90% महिलायें घरेलू हिंसा की शिकार है । घरेलू हिंसा पर रोक लगाने के लिए 2007 में क़ानून आया लेकिन ये क़ानून भी महिलाओं पर होने वाले अपराध पर लगाम लगाने में विफल साबित हो रहा है। इस तरह की घटनाओं से रूह काँप उठती हैं, इन्सानियत तार- तार हो रही है । रोंगटे खड़े कर देने वाली इन घटनाओं को रोकने के लिए मैंने 2012 में अखिल भारतीय महिला शक्ति मंच का गठन किया जिस मंच के तहत कोई भी महिला अपने अधिकारो की लड़ाई लड़ सकती है ।
डॉ सन्तोष दहिया ।