हरियाणा जैसा प्रदेश जंहा पर्दा को प्रथा का नाम दिया गया हो उससे महिलाओ को निजात दिलाना एक अनोखा प्रयास ही हो सकता है ।क्योंकि हरियाणा वह प्रदेश है जो हमेशा खुशहाल और सम्पन्न रहा ।इसमे ज्यादातर किसान लोग रहते है जो खेती करके केवल अपने परिवार का भरण पोषण ही नहीं करते बल्कि देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने मे अहम भूमिका निभाते है।प्राचीन समय मे पर्दा प्रथा नाम की कोई चीज नही थी लेकिन गुलामी के दौर मे आक्रान्ताओं ने हम पर आक्रमण किया तब अपनी बहू बेटियों को बचाने के लिए उन्हे परदे मे रखना शुरू कर दिया था ।
parda partha
क्योंकि आक्रमणकारी सबसे पहले धन दौलत को हथियाते थे और उसके बाद बहू बेटियों पर क्रूर दृष्टि रखते थे।उसी से बचने के लिए ये पर्दा प्रथा शुरू हुई ।1947 में हम आजाद तो हो गए लेकिन आज़ादी के जश्न में हम भूल गए कि जो पर्दा मज़बूरी में शुरू किया था उस परदे की अब कोई ज़रूरत नहीं है । मैं इसे महिलाओं का दुर्भाग्य ही मानती हूँ कि आज़ादी के लगभग 7 दशक के बाद भी बहू उसी परदे में रहती है। जबकि हमारी बेटियों ने समय समय पर अपने बूते देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है। अब इस बात पर विचार होना चाहिये कि क्या साइना नेहवाल, कल्पना चावला, मैरी कोम जैसी बेटियाँ अपना नाम रोशन कर पाती अगर इन्हे परदे में रखा जाता? कदापि नहीं। मेरा मानना है कि हम जब तक स्त्री को सम्पत्ति की तरह मानते रहेंगे तब तक मन में ये भय रहेगा कि यह एक वस्तु है इसे दूसरा कोई देख ना ले। जबकि महिलायें बड़ी ईमानदारी और संवेदनशिलता से अपना दायित्व निभा रही है। मेरे अन्दर इसी सोच ने जन्म लिया और मैंने ठान लिया कि उन बेटियों को परदे से निजात दिलाने की कोशिश करूंगी जो आज उड़ान भरने को तैयार हैं क्योंकि परिवर्तन समय के साथ ज़रूरी है। और पर्दा प्रथा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पहली आवाज़ बन कर खडी हो गई।शुरुवाती दौर में मुझे जहाँ भी मौक़ा मिलता लोगों को समझने का प्रयास करने लगी ।जब लोगों का समर्थन मिलने लगा तो 30 एप्रिल 2014 को कुरुक्षेत्र के गांव पीपली से इसकी शुरुआत कर दी । मेरी कोशिश है कि हर महिला को जीने का एक समान अधिकार मिलना चाहिए । मुझे उम्मीद है कि हम अपने अभियान मे कामयाब होंगे और हमारे बुज़ुर्ग भी इसकी इजाज़त देंगे ।मेरा ये अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक घूँघट में सिमटी वो आख़िरी महिला खुली ऑखो से उगते सूरज को ना देख ले ।